पारदर्शिता से परहेज करते राजनीतिक दल

07.12.2016

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लेखक-सुधीर पाल, पत्रकार

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केन्द्रीय सूचना आयोग के फैसले को डस्टबिन में डालने के बाद सरकार राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून 2005 के दायरे से बाहर करने की जुगत में है। सरकार के इस प्रस्ताव पर लेफ्ट-राइट किसी के भी ऐतराज करने की गुंजाइश नहीं है। पारदर्शिता और खुलासा हमेशा से ‘पड़ोस’ की वस्तु रहे हैं और राजनीतिक दल ‘शुचिता’, पारदर्शिता और जवाबदेही को ‘पड़ोस’ की वस्तु बनाये रखने के अ भियान में माहिर हैं। ‘दाग’ और ‘धब्बे’ भारतीय राजनीति का सबसे प्रचलित जुमला है और पूरी राजनीति ले ‘मेरी कमीज तुझसे सफेद’ की तर्ज पर चल रही हो, लेकिन जब भी ‘हमाम’ की बारी आती है, सब नंगे एक साथ हो जाते हैं। केन्द्र की मोदी सरकार उन छहों राजनीतिक दलों के बचाव में कमर कसकर मैदान में है, जिन्हें राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त है और केन्द्रीय सूचना आयोग ने सरकारी अनुदान, जमीनों के अनुदानित आवंटन इत्यादि के चलते उन्हें सार्वजनिक संस्थान करार दिया हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रही याचिका पर राजनीतिक दलों के जवाब से पहले स्वयं सरकार शपथपत्र देकर यह कह चुकी है कि राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने से दलों के संचालन में बाधा आएगी। आरटीआई कानून लागू होते समय यह पता ही नहीं था कि पारदर्शिता कायम रखने के लिए लाने वाले इस कानून के तहत राजनीतिक दलों को भी लाया जा सकता है। बहरहाल, पारदर्शिता से राजनीतिक दलों को परहेज क्यों है? केन्द्रीय सूचना आयोग में जब यह मामला लंबित था तो एक वामपंथी दल के महासचिव ने कहा था कि नैतिक तौर पर हम चाहते हैं कि राजनैतिक दल भी सूचना अधिकार कानून में दायरे में आयें, लेकिन अपील के वक्त वे स्वयं अन्य दलों के साथ राग अलाप रहे हैं कि कानूनी तौर पर यह उचित नहीं है। इस दल का दावा है कि उन्होंने कभी किसी कारपोरेट घराने से फंड नहीं लिया, दल की फंडिंग का स्रोत सिर्फ सदस्यता शुल्क, लेवी और डोनेशन हैं। आयकर रिटर्न नियमित फाइल किये जाते हैं और सौ फीसदी बुक्स ऑफ एकाउंट मेन्टेन किये जाते हैं, लेकिन सूचना अधिकार कानून के दायरे से राजनीतिक दलों को बाहर लाने के अ भियान का यह यह दल अगुवा बना हुआ है। सूचना अधिकार कानून का चैम्पियन और इस कानून को लाने वाली लग ग 3000 करोड़ कांग्रेस पार्टी का इसके दायरे से बाहर आने की कशमकश और उतावलापन तो समझ आता है, लेकिन जब वामपंथी भी इसके साथ हो जाते हैं तो लगता है कि कुछ गड़बड़झाला है। यूपीए-2 के शासन में घोटालों की लंबी श्रृंखला के सिरमौर कांग्रेसी ही बने हुए हैं। लग ग 1000 करोड़ की भाजपा बाकी दलों का सुर अलाप रही है। ये दोनों दल देश में कारपोरेट जगत के सबसे चहेते हैं। कारपोरेट फंडिंग का हिस्सा इन्हीं दोनों दलों को ज्यादा जाता है और जाहिर है कि पब्लिक से कारोबार के लिये पैसा बटोरने वाली कम्पनियों के लिये मुश्किल है, शेयरधारकों को बताना कि उन्होंने यह ‘दान-पुण्य’ क्यों किया। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में एक मामले में टिप्पणी की थी- सत्ता की चाह में राजनीतिक दलों ने एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए लेकिन इस खर्च का न कोई खाता-बही है और न ही जवाबदेही। कहां से पैसा आता है, कहां जाता है, कोई नहीं जानता। राजनीतिक दलों की 70 फीसदी आय का स्रोत अज्ञात एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक (एडीआर) रिफॉर्म्स के साल 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय का 69.3 प्रतिशत अज्ञात स्रोत से आया था। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार साल 2013-14 में छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पास कुल 1518.50 करोड़ रुपये थे। राजनीतिक दलों में सबसे अधिक पैसा बीजेपी (44) के पास था। वहीं कांग्रेस (39.4), सीपीआई(एम) (8), बीएसपी (4.4) और सीपीआई (0.2) का स्थान था। स ी राजनीतिक दलों की कुल आय का 69.30 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से आया था। राजनीतिक पार्टियों को अपने आयकर रिटर्न में 20 हजार रुपये से कम चंदे का स्रोत नहीं बताना होता। पार्टी की बैठकों-मोर्चों से हुई आय ी इसी श्रेणी में आती है। साल 2013-14 तक सभी छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय में 813.6 करोड़ रुपये अज्ञात लोगों से मिले दान था। वहीं इन पार्टियों को पार्टी के कूपन बेचकर 485.8 करोड़ रुपये की आय हुई थी। जब के आंकड़े हैं तब कांग्रेस सत्ता में थी और बीजेपी विपक्ष में और यही दोनों दल अज्ञात स्रोत से चंदे के मामले में भी बाकी पार्टियों से आगे थे। साल 2013-14 में कांग्रेस की कुल आय 598.10 करोड़ थी जिसमें 482 करोड़ अज्ञात स्रोतों से आए थे। कांग्रेस को कुल आय का 80.6 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से मिला था। बीजेपी की कुल आय 673.8 करोड़ रुपये थी जिसमें 453.7 करोड़ रुपये अज्ञात स्रोतों से आए थे। बीजेपी को कुल आय का 67.5 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से मिला था। सीपीआई (एम) की कुल आय 121.9 करोड़ रुपये थी जिसमें अज्ञात स्रोतों से आय 58.4 करोड़ रुपये थी। सीपीआई (एम) की कुल आय के 47.9 प्रतिशत का स्रोत अज्ञात था। लोक प्राधिकार का दायरा राजनीतिक दलों का तर्क है कि वे सरकारी दफ्तर नहीं हैं, लोक प्राधिकार की परिभाषा में नहीं आते हैं। सूचना अधिकार कानून 2005 की धारा 2 (एच) की बात करें तो राजनीतिक दल संविधान के अनुच्छेद के तहत गठित नहीं हैं, संसद ने स्थापित नहीं किया है, न ही सरकार से वित्त संपोषित और सरकार के आदेश से गठित हुए हैं। राजनैतिक दलों की स्थापना, उद्देश्य और कार्य-कलापों की बात करें तो यह कभी निजी किस्म का नहीं रहा है। राजनीतिक दलों के चरित्र और कामकाज के तौर-तरीकों और मूल्यों में गिरावट के बाद भी दलों के लिये जनता सर्वोपरि है। रात-दिन लोकतंत्र और जनता की दुहाई देने वाली इन संस्थाओं को जनता के सवाल से ही डर लग रहा है तो लोकतंत्र का विष्य सहज दिखता है। कौन नहीं जानता है कि राजनीतिक दल सरकारी खर्चे पर चुनाव नहीं लड़ते हैं, राजनीति का संचालन वे लोगों से प्राप्त चंदे, अनुदान और शुल्क से करते हैं और जनहित के मद्देनजर ही तो आयकर की धारा 13 (ए) के तहत इन्हें 100 फीसदी आयकर छूट प्राप्त है